
विज्ञान और खोज
जीवाश्म पंखों से जुरासिक काल के कीटों के ध्वनि-परिवेश का पता चला
वैज्ञानिकों ने लगभग 16.5 करोड़ वर्ष पहले रहने वाली नौ कीट प्रजातियों की संभावित पुकारों का पुनर्निर्माण किया है। इससे जुरासिक काल का ऐसा ध्वनि-परिवेश सामने आया है जिसमें झींगुर जैसी आवाजों से लेकर मानव श्रवण सीमा से परे की पराश्रव्य ध्वनियां शामिल थीं।
अंतरराष्ट्रीय टीम ने चीन के इनर मंगोलिया में मिले जीवाश्मों के 20 असाधारण रूप से संरक्षित अग्रपंखों का अध्ययन किया। झींगुरों और कैटिडिडों के ये विलुप्त संबंधी घर्षण के जरिए ध्वनि उत्पन्न करते थे, यानी एक पंख की विशेष संरचनाओं को दूसरे पंख से रगड़ते थे। चूंकि ये कठोर संरचनाएं जीवाश्म बन सकती हैं, इसलिए उनका आकार उन कंपनों के संकेत संजोए रखता है जिन्हें वे कभी पैदा करती थीं।
शोधकर्ताओं ने जीवाश्म पंखों की संरचना के मापों को विकासक्रम संबंधी तुलनाओं, जीवित कीटों के पंखों के लेजर अध्ययनों, कंप्यूटर सिमुलेशन और मशीन-लर्निंग मॉडलों के साथ जोड़ा। पुनर्निर्मित अधिकांश पुकारें लगभग 5 किलोहर्ट्ज की निम्न आवृत्ति वाली शुद्ध ध्वनियां थीं, जबकि अन्य प्रजातियां अधिक ऊंची आवृत्तियों का इस्तेमाल करती थीं। एक प्रजाति लगभग 20.5 किलोहर्ट्ज तक पहुंचती प्रतीत होती है, जो पराश्रव्य सीमा की शुरुआत में आती है।
यह खोज पशुओं में पराश्रव्य संचार का सबसे पुराना ज्ञात प्रमाण है और दिखाती है कि ऐसा संचार चमगादड़ों और उनकी प्रतिध्वनि से दिशा तथा दूरी पहचानने की क्षमता से बहुत पहले मौजूद था। इससे उस धारणा को चुनौती मिलती है कि केवल शिकार करने वाले चमगादड़ों के दबाव ने कीटों को उच्च-आवृत्ति संकेतों की ओर प्रेरित किया। शोधकर्ताओं का सुझाव है कि शुरुआती स्तनधारियों द्वारा उनकी आवाजें सुन लेना, शुद्ध ध्वनियों के स्रोत का स्थान पहचानने में कठिनाई और ध्वनिक गुंजाइश के लिए प्रजातियों के बीच प्रतिस्पर्धा ने भी इन प्राचीन पुकारों को आकार दिया होगा, हालांकि विकासक्रम को प्रभावित करने वाले सटीक दबाव अब भी अनिश्चित हैं।