
विज्ञान और खोज
शार्क के दांतों ने मिस्र के पश्चिमी रेगिस्तान के नीचे क्रिटेशियस काल के समृद्ध समुद्र के प्रमाण उजागर किए
जीवाश्म विज्ञानियों ने मिस्र के अबू-तर्तूर पठार पर प्राचीन शार्क की ज्ञात विविधता का विस्तार किया है और आज के पश्चिमी रेगिस्तान के नीचे एक उत्पादक समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के प्रमाण खोजे हैं। पहले रिपोर्ट न किए गए चौदह दांत शार्क की पांच ऐसी प्रजातियों के हैं जो इस स्थल पर पहले दर्ज नहीं हुई थीं। इससे वहां ज्ञात प्रजातियों की कुल संख्या कम-से-कम सात हो गई है।
ये जीवाश्म फॉस्फेट से समृद्ध डुवी शैलसमूह से मिले हैं, जो क्रिटेशियस काल में बना था, जब उत्तरी अफ्रीका आंशिक रूप से जलमग्न था। यह काल लगभग 14.5 करोड़ से 6.6 करोड़ वर्ष पहले का था। पहचानी गई दो प्रजातियां, Serratolamna cf. serrata और Squalicorax bassanii, मिस्र में पहली बार दर्ज हुई हैं। Scapanorhynchus cf. raphiodon से संबंधित माने गए सुई जैसे दांत अफ्रीका में इस प्रजाति की पहली ज्ञात मौजूदगी और जीवाश्म रिकॉर्ड में इसकी सबसे हाल की मौजूदगी का संकेत भी हो सकते हैं।
पतले, भेदने वाले दांतों से लेकर चौड़े, आरी जैसे किनारों वाले दांतों तक की विविधता संकेत देती है कि शार्क अलग-अलग पारिस्थितिक भूमिकाएं निभाती थीं। शोधकर्ताओं का मानना है कि गहरे समुद्र के पानी के ऊपर उठने से पोषक तत्व सूर्य की रोशनी वाली सतह की ओर आए, जिससे प्लवक, मछलियों और अकशेरुकी जीवों को पोषण मिला और अंततः कई बड़े शिकारी जीव भी पनपे।
यह जमाव इस बात का प्रमाण नहीं है कि सातों प्रजातियां साथ रहती थीं और साथ ही मरीं। तलछट धीरे-धीरे जमा होने के कारण फॉस्फेट की परत ने अलग-अलग समय और समुद्री परिवेशों के अवशेषों को एक ही परत में समेट दिया। फिर भी, यह जीवाश्म समूह उस समृद्ध समुद्र का दुर्लभ रिकॉर्ड देता है जो कभी आज के इस शुष्क भूभाग को ढके हुए था।