विज्ञान और खोज

प्रयोगशाला अध्ययन में कीमोथेरेपी के बाद बचने वाली कैंसर कोशिकाओं की कमजोरी सामने आई

ट्रिनिटी कॉलेज डबलिन के शोधकर्ताओं ने कीमोथेरेपी के बावजूद जीवित रहने वाली कैंसर कोशिकाओं में जीवित बचे रहने की एक प्रक्रिया खोजी है। मानव कोशिकाओं पर प्रयोगशाला परीक्षणों में उन्हें ऐसे यौगिक भी मिले जिन्होंने विभाजन बंद कर चुकी “ज़ॉम्बी जैसी” अवस्था वाली कोशिकाओं को चुनिंदा रूप से मार दिया।

सीमस मार्टिन और गोखान गुनाय के नेतृत्व में हुआ यह अध्ययन Science Advances में प्रकाशित हुआ है। इसका केंद्र IAPs नामक प्रोटीन थे। ये प्रोटीन उन संकेतों को रोकते हैं जो क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को स्वयं नष्ट होने के लिए प्रेरित करते हैं। जब कीमोथेरेपी किसी कैंसर कोशिका के डीएनए को नुकसान पहुंचाती है, तो IAPs इस प्रतिक्रिया को बाधित कर सकते हैं, जिससे कोशिका जीवित रह जाती है।

बचने वाली कुछ कोशिकाएं सेनेसेंस नामक अवस्था में चली जाती हैं: उनका विभाजन रुक जाता है, लेकिन वे सक्रिय रहती हैं। वे सूजन संबंधी संकेत छोड़ती हैं जो प्रतिरक्षा कोशिकाओं को आकर्षित करते हैं और घाव भरने की प्रक्रियाओं को बढ़ावा दे सकते हैं। ट्यूमर इन मरम्मत प्रक्रियाओं का फायदा उठाकर इलाज के बाद फिर पनप सकते हैं।

शोधकर्ताओं ने पाया कि सेनेसेंस अवस्था वाली ये कोशिकाएं जीवित रहने के लिए IAPs पर बहुत अधिक निर्भर थीं। इन प्रोटीनों को रोकने वाले यौगिकों ने स्वयं नष्ट होने के संकेत दोबारा सक्रिय कर दिए और चुनिंदा रूप से इन कोशिकाओं को खत्म कर दिया।

इससे एक संभावित रणनीति सामने आती है: कीमोथेरेपी के बाद ऐसा इलाज देना जो कोशिकाओं के जीवित बचे रहने की इस प्रक्रिया को निशाना बनाए। यह आगे के शोध के लिए आशाजनक दिशा है, स्थापित इलाज नहीं। निष्कर्ष प्रयोगात्मक हैं और इस अध्ययन ने मरीजों के लिए लाभ प्रदर्शित नहीं किया है।

स्रोत

  1. Rai newsTumori, scoperte cellule zombie che resistono alla chemio: lo studio inglese
  2. il Giornale.itTumori, la scoperta: le cellule si trasformano in "zombie", cosa succede
  3. www.tcd.ieTrinity scientists discover how cancers evade chemotherapy by entering “Zombie-like state”

रिपोर्टिंग संबंधी टिप्पणियाँ

यह जानकारी कहाँ से आई

Trinity College Dublin

मुख्य निष्कर्ष ट्रिनिटी कॉलेज डबलिन की टीम और Science Advances में प्रकाशित उसके अध्ययन से आते हैं। ट्रिनिटी कॉलेज डबलिन ने मूल संस्थागत विवरण दिया है; il Giornale.it ने उसी शोध से प्रयोग संबंधी अतिरिक्त जानकारी जोड़ी है, जबकि Rai news ने प्रक्रिया को समझाया है और उसकी प्रयोगात्मक स्थिति स्पष्ट की है। ये एक ही अध्ययन के विवरण हैं, स्वतंत्र पुनरावृत्तियां नहीं।